
गाजियाबाद- उत्तर में उपचुनाव की सरगर्मी तेज होती जा रही है। लेकिन गाजियाबाद में चुनावी सियासत चरम पर है। पिछली कई टर्म से गाजियाबाद में वैश्य समाज इस सीट पर अपनी धाक जमाता रहा है। बात चाहे स्वर्गीय सुरेन्द्र गोयल की हो या अतुल गर्ग की या फिर स्वर्गीय सुरेश बंसल की गाजियाबाद सदर सीट यानी गाजियाबाद विधानसभा क्षेत्र 56 के लिए वैश्य समाज एमएलए देता रहा है। लेकिन इस बार यहां के विधायक अतुल गर्ग संसद जा पहुंचे और उपचुनाव की नौबत आ गई। लेकिन बीजेपी के लिए उम्मीदवार घोषित करना एक चुनौती बना रहा। कभी पंजाबी समाज अपनी वफादारी के बदले टिकट मांगता दिखा तो कभी कोई और गुट। कभी अशोक मोंगा या सरदार एसपी सिंह दौड़ में आगे दिखाई दिए तो कभी मयंक गोयल, एक दो दिन तो पूर्व सांसद वीके सिंह जी की सुपुत्री सुश्री मृणाली सिंह का नाम भी चर्चा में रहा, लेकिन आखिरकार सत्ताधारी बीजेपी ने अपने स्थानीय संघठन के भरोसेमंद नाम संजीव शर्मा पर दांव खेल दिया है। हालांकि संजीव शर्मा की स्थिति पर संशय करने वाले कम ही नजर आ रहे हैं लेकिन फिर भी सियासत में मतदाताओं का मिज़ाज अनिश्चित होता है और सामने वालों की रणनीति इंम्पोरटेंट।
तो आइए जाएजा लेते हैं संजीव शर्मा के अलावा दूसरे दलों ने किन किन को मैदान में उतारा है।
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने शहर के एक बड़े केबिल आपरेटर और निर्विवादित दलित चेहरे के तौर पर सिंहराज जाटव को मैदान में उतारकर यकीनन एक बड़ी सोशल इंजीनियरिंग का दांव खेला। सिंहराज जाटव का राजनीतिक सफर लंबा तो नहीं जिसकी वजह से उनकी चुनौतियां बढ़ती नजर आ रही हैं। लेकिन सिंहराज जाटव अगर अपने समाज के अलावा कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के परंपरागत वोट को साध सके तो बड़ा सियासी उलटफेर हो सकता है। लेकिन सिंहराज जाटव के लिए बीएसपी और आजाद समाज पार्टी के उम्मीदवार तो चुनौती हैं ही साथ ही हाल ही में बीएसपी पर कथित तौर पर टिकट के लिए मोटी रकम वसूली के आरोप लगाने वाले रवि गौतम का नाम भी चुनौती ही है। दरअसल बीएसपी पर कथितरूप से टिकट के नाम पर मोटी उगाही के आरोप लगते रहे हों लेकिन बीएसपी से उम्मीदवारी ठोंकने वाले को यह उम्मीद तो रहती ही हैं कि दलित समाज का एकमुश्त वोट बहन जी के नाम पर उसकी झोली में आना तो पक्का है ही। हालांकि एक तो दलित समाज बहन जी मायावती के पिछले कुछ कथित रिकार्ड्स और आरोपों के बाद जागरूकता का परिचय देते हुए किसी सियासी ठेकेदार का बंधुआ वोटर नहीं बने रहना चाहता, दूसरे दलित समाज में चंद्रशेखर रावण के तेवरों के बाद बीएसपी और मायावती जी का दलित समाज पर एकछत्र राज ढलान की तरफ जाता दिखाई दे रहा है। बावजूद इसके बहन मायावती की बीएसपी और चंद्रशेखर रावण की एएसपी के उम्मीदवार समाजवादी के सिंहराज जाटव के लिए चुनौती बन सकते हैं और बीजेपी उम्मीदवार के लिए संजीवनी। लेकिन जहां तक सवाल है बीएसपी के वैश्य समाज के उम्मीदवार का, तो क्या इस बार वैश्य समाज बीजेपी के मुकाबले में बीएसपी को गले उतार पाएगा। हालांकि कुछ लोग पूर्व में स्वर्गीय सुरेश बंसल का उदाहरण देते हैं। लेकिन वर्तमान समय में बीएसपी के उम्मीदवार के साथ न तो नरेंद्र कश्यप जैसा ओबीसी चेहरा दिखाई दे रहा है , और फिर प्रभारी के तौर पर शमसुद्दीन राइन और गाजियाबाद समाजवादी पार्टी अध्यक्ष के चाचा चौधरी मुजाहिद जैसे कुछ मुस्लिम चेहरे भी वैश्य समाज को सोचने पर मजबूर कर सकते हैं। इसके अलावा सवाल यह भी है कि मायावती जी से कथित तौर पर बेहद नाराज़ चल रहा मुस्लिम समाज क्या उपचुनाव में बीएसपी पर भरोसा कर पाएगा। ठीक इसी तरह आजाद समाज पार्टी के सतपाल चौधरी के लिए चुनौतियां कम नहीं हैं। सबसे पहले तो बार बार उनका पार्टियां बदलते रहना ही चर्चा की वजह बना हुआ है, हालांकि उसके जवाब में संजीव शर्मा जैसे नाम रखे जा सकते हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि चाहे दलित समाज हो या फिर मुस्लिम समाज भी तब ही सतपाल चौधरी से जुड़ सकते हैं जब खुद उनका जाट समाज मजबूती से खड़ा होता दिखेगा। लेकिन एक तो स्वर्गीय चौधरी चरणसिंह की विरासत वाले जयंत चौधरी का खुद बीजेपी के साथ गठबंधन में शामिल होना सतपाल चौधरी के लिए अच्छे संकेत नहीं दे रहा, दूसरे अभी चंद्रशेखर रावण की पार्टी गाजियाबाद में अपना वजूद तलाश रही है। हालांकि सतपाल चौधरी व्यक्तिगत रूप से एक जुझारू छवि को लेकर बहुत उत्साहित नजर आ रहे हैं। लेकिन इस बीच असदुद्दीन ओवैसी साहब की एएमआईएम की तरफ से रवि गौतम के नाम की भी चर्चा चल रही है। जोकि सीधे तौर पर मुस्लिम समाज और दलित समाज दोनों के दम ताल ठोंक रहे हैं। साथ ही दलित समाज में उनकी मजबूत पैठ और बहन जी मायावती पर कथितरूप से मोटी रकम के बदले दलित वोटों की सौदेबाजी के आरोप लगाने वाले रवि गौतम गाजियाबाद की दलित सियासत में भी मजबूत पैठ बनाना चाहते हैं। जबकि अभी आम आदमी पार्टी समेत कुछ ओर नामों का इंतजार बाकी है। यानी गाजियाबाद के उपचुनाव को बेहद दिलचस्प होने वाला है। बहरहाल गाजियाबाद में उपचुनाव के नतीजे कुछ भी हों लेकिन फिलहाल जनता हैरान है कि किसको चुनें और किसको रिजेक्ट करें।