
नई दिल्ली (3 जनवरी 2020)- साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय, सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय। ये कबीर दास जी भी सैंकड़ों साल पहले ऐसा दोहा मार गये कि आज के लगभग हर नेता ने इसको अपने ढंग से इस्तेमाल करना शुरु कर दिया है। यानि जो मतलब ही बात हो उस पर शोर मचाओ बाक़ी पर गुलाटी मार कर बैठ जाओ। गोरखपुर में बच्चों की मौत पर भाजपाई चुप थे, तो अब राजस्थान के कोटा में अस्पताल में सैंकड़ो बच्चों की मौत पर कांग्रेस और प्रियंका समेत सभी की बोलती बंद है। ये अलग बात है कि प्रियंका और कांग्रेस इन दिनों मुस्लिम प्रेम में सराबोर दिखने की कोशिश में लगे हैं।
दरअसल आजकल कांग्रेस और उसके नेता मुसलमानों को लेकर ख़ासे चिंतित नज़र आ रहे हैं। हांलाकि कुछ लोग ये भी कह रहे हैं कि हाल ही में गांधी परिवार से स्पेशल प्रोटैक्शन ग्रुप यानि एसपीजी हटाए जाने के बाद से ही कांग्रेस आंदोलन के लिए किसी मुद्दे के इंतज़ार में थी। बहरहाल किसी भी लोकतंत्र के लिए ये एक बेहतर बात कि जब-जब सत्ता अपनी ताक़त का दुरुपयोग करे तब-तब विपक्ष उस पर लगाम लगाने का काम करे। और ठीक ऐसा ही तब होता नज़र आया जब CAB, CAA और NRC की आड़ में मुस्लिम समाज के शोषण की बात सामने आई। कांग्रेस खुलकर मैदान दिखने लगी और भाजपा सरकार के खिलाफ आंदोलन किया जाने लगा। ये अलग बात है कि कांग्रेस को बतौर इनाम झारखंड की सत्ता में भागीदारी प्राप्त भी हो गई। क्योंकि भले ही ओवैसी साहब ने सीएए को लेकर ज़बरदस्त तरीक़े से ध्रुवीकरण करना चाहा हो, लेकिन मुस्लिम समाज ने झारखंड के चुनाव में हिंदु मुस्लिम के नज़रिये से नहीं बल्कि राष्ट्रहित और विकास के लिए वोट किया था।
इस दौरान जबकि कांग्रेस सीएए और एनआरसी को लेकर आक्रामक तेवर दिखा रही हो, लेकिन कांग्रेस शासित राज्य राजस्थान के कोटा 100 बच्चों की अस्पताल में मौत पर के बाद कुछ ऐसे सवाल उठने लगे की जिनका जवाब कांग्रेस और उनके नेताओं को देना होगा।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि सीएए को लेकर वही कांग्रेस और प्रियंका गांधी मुसलमानों की हमदर्द होतीं दिख रही हैं, जिनकी सत्ता में बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखने का मामला हो या फिर मस्जिद में ताला डलवाने से लेकर मुस्लिमों को नमाज़ से वंचित करके पूजा के लिए ताला खुलवाना और मस्जिद की शहादत के अफसोसनाक सफर के अलावा, अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले सैंकड़ो दंगों की दर्दनाक कहानी लिखी जाती रही हो। चाहे मेरठ में हुआ निगार कांड जिसमें 30 से ज्यादा मुस्लिमों की मौत हुई, चाहे मलियाना और हाशिमपुरा का नरसंहार हो जिसमें उस समय की कांग्रेसी पुलिस ने लाइन में खड़ा करके दर्जनों लोगों को मौत की नींद सुलाकर उनकी लाशें नहर में बहाईं हों। या फिर 1984 का वो सिख नरसंहार जिसके बारे में खुद कांग्रेस के बड़े नेता ने कथिततौर,जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो हलचल होती है, जैसा बयान देकर देश के अल्पसंख्यक समाज के ज़ख्मों पर मरहम के बजाय नमक लगाने का काम किया हो। साथ ही मुरादाबाद का मुस्लिम समाज भला ये कैसे भूल जाए कि ख़ास ईद के दिन ईदगाह मे नमाज पढ़ रहे निहत्थे लोगों पर पुलिस ने चारों तरफ से गोलियां बरसा कर सैंकड़ों घरों के चूल्हे बुझा दिये थे। इतना ही नहीं दलितों के साथ हुए कई मामले आज भी अनसुलझे हैं।
वही कांग्रेस और उसका हाइकमान ये कैसे भूल जाता है कि इतने साल बाद तक न तो कभी कोई बड़ा कांग्रेसी नेता न ही गांधी परिवार का कोई ज़िम्मेदार इन सब ज़ख़्मों के लिए अल्पसंख्यक,दलित,सिख और मुस्लिम समाज से कोई वार्ता ही कर पाया है, न ही इस सब पर कोई माफी ही मांगी है। इंतिहा तो ये हुई कि ख़ुद कांग्रेस के कई नेताओं तक को इसकी शर्मिंदगी रही, सबूत के तौर कांग्रेसी दिग्गज सलमान ख़ुर्शीद से स्वीकार किया कि कांग्रेस के दामन पर ख़ून के दाग़ है। साथ ही गुजरात दंगो में कांग्रेस की सांसद रहे एहसान जाफरी मार डाले गये। उनकी विधवा ज़किया जाफरी आज भी इंसाफ को दर दर भटक रहीं हैं। क्या कभी अहमद पटेल, सोनिया गांधी, राहुल गांधी या फिर प्रियंका गांधी ने उनसे मिलकर कोई सार्वजनिक बयान दिया। लोगों का कहना है कि जब अपने ही सांसद के लिए कांग्रेस का ये रवय्या है तो भला आम जनता क्या उम्मीद करेगी।
ऐसे में मलियाना,हाशिमपुरा आदि को भूलकर सीएए आंदोलन के बाद प्रियंका गांधी का मेरठ जाने की ज़िद करना या फिर मुस्लिम हितैषी दिखाना कुछ हज़म होता नहीं दिखता। ख़ासतौर से जब कि उनकी पार्टी के शासन वाले राज्य राजस्थान में 100 से ज्यादा बच्चों की मौत पर अभी तक इनका कोई बयान या दौरा जनता को नहीं दिखा है।
कांग्रेस को अगर पुरानी गल्तियों से सबक़ लेना है को सबसे पहले वो यह तय करे कि उनके युवराज और नई मालकिन किन लोगों की सलाह पर काम कर करते हैं। दरअसल कभी जिसने देश में कांग्रेस मुक्त भारत का नज़रिया पेश किया,उन्ही पीके को कांग्रेस करोड़ों ख़र्च करके अपना सलाहकार बना लेती है। साथ ही जो लोग संकट के समय में कांग्रेस को डूबती नय्या बताकर कूद गये थे, वही लोग अब दोबारा कांग्रेस हाइकमान के टच मे बताए जा रहे हैं।
ऐसे में अगर बिल्ली के भागों छींका टूटा वाली कहानी दोहराते हुए कुछ राज्यों में चाहे मामूली मार्जिन से या फिर गठबंधन से सत्ता में आई कांग्रेस अपने सबसे मज़बूत वोटर भारत के आम नागरिक, दलित और मुस्लिम समाज को विश्वास में नहीं ले पाती है तो उसके लिए आगे का रास्ता बहुत आसान नहीं रहेगा।